एक कविता।

खुद की ही तलाश रही और खो गयी उन यादों में,
तनहायी का दामन थामे सिमट गयी उन बाहों में।

खुद को तो मैं भूल गयी अब तेरी ही तलाशों में,
खुद से लिपट मैं झूल गयी यादों के लिबासों में।

नामुकम्मल ख़्वाब और नामुकम्मल रिश्तों में,
मुकम्मल सी बेचैनी है तनहायी के आलम में।

किरकिरी सा चुभता है वो मिट्टी बनकर आँखों में,
आँखों से निकले अश्कों संग तेरी यादों के बहने में।

क़रीब से गुज़रा था वो हवा के संग बहने में,
रोएँ रोएँ में उभर गया संदली हवा महकने में।

नीरज ‘मनन’