तुम प्रेम हो, तुम गीत हो, संगीत हो मेरे,
तुम बांसुरी, मैं राधिका, मनमीत हो मेरे।
मै दिवानी प्यार की तुम कृष्ण हो मेरे,
तुम रास हो, तुम रंग हो, पर संग हो मेरे।

बाँसुरी की धुन पर अब ख़्वाब बुनती हुँ
ख़्वाब की बग़ीची में फिर फ़ूल चुनती हुँ
धुन तेरी जब गीत गाए, मन रचे फेरे।
तुम प्रेम हो, तुम गीत हो, संगीत हो मेरे

बात तेरी जब सुन कभी मैं कान लगाती हुँ
बाँसुरी होठों पर लगा जब चूम जाती हुँ
आलिंगन तेरा पालूँ , तुम हमनशीं मेरे।
तुम प्रेम हो तुम गीत हो संगीत हो मेरे।

साथ तेरा सोच सोच अब झूम जाती हुँ,
सावन के कितने झूले जाने झूल जाती हुँ।
अब तो साँस लेती हुँ हर एक साँस हो मेरे।
तुम प्रेम हो तुम गीत हो संगीत हो मेरे।

तेरे नाम का शब्द-शब्द काग़ज़ पर लिखती हुँ।
चूम उसे और देख उसे हर पल अब जीती हुँ।
राधिका सा नाम लो तुम श्याम हो मेरे।
तुम प्रेम हो, तुम गीत हो संगीत हो मेरे।

नीरज “मनन”