दोस्तों पेश कर रहा हुँ एक नयी poetry..

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सुनो, आज मैं एक ग़ज़ल लिख रहा हुँ।

अल्फ़ाज़ में ढालकर, तुझे लिख रहा हुँ।

 

तुम मेरे लफ़्ज़ों में, बहकर आ जाओ,

धीमे-धीमे से, अहसास लिख रहा हुँ।

 

तेरा-मेरा मरासिम, कितना पुराना है,

मैं तो इसे अब भी, क़रीब लिख रहा हुँ।

 

काग़ज़ पर तेरा अब, अक़्स उभरता है,

अब मैं तुझे, हमसफ़र लिख रहा हुँ।

 

बहक रहे हैं लफ़्ज़, मेरे तुम्हें सोचकर

बहकी-बहकी सी, ग़ज़ल लिख रहा हुँ।

 

अल्फ़ाज़ों में तुम या तुमसे अल्फ़ाज़ हैं,

ख़यालों में खोकर ग़ज़ल लिख रहा हुँ।

 

शब ढलते ही पत्तों पर आ जाते हो,

कचनारों पर शबनम तुझे लिख रहा हुँ।

 

फूलों से सजी कश्मीर सी दिख रही हो

कमनीय केसर क्यारी, तुम्हें लिख रहा हुँ।

 

सुनो, आज मैं एक ग़ज़ल लिख रहा हुँ

अल्फ़ाज़ में ढालकर तुझे लिख रहा हुँ।

 

नीरज “मनन”