अल्फ़ाज़ों में तुम हो, या तुम पर अल्फ़ाज़,
पढ़ लो ये ग़ज़ल, लिखी है तुम्हारे लिए।

जब बेपनाह इश्क़ होता है, दिल के अंदर।
तब इंसान ज़िंदा तो होता है,
‘मनन’ मगर किसी और के अंदर।

मुझे शायरी का तजुर्बा तो नहीं ‘मनन,
मगर लोग कहते हैं,
मैं जो लिखता हूँ वो लाजवाब है।

मनन’ के नमन को इस महफ़िल में, स्वीकार कर लो तुम।
मनन के शब्दों पर अब इश्क़ का , इजहार कर लो तुम।
कलम से शब्दों को आकार, देकर ग़ज़ल बनायी है,
ग़ज़ल को गा गाकर होठों से, अब इकरार कर लो तुम।

तुम्हारा ख़ंजर भी हँसीं है,
क़त्ल करने की अदा भी हँसीं है।
तुमको देखते ही यूँ,
मर जाने को जी चाहता है।

अगर मेरे शब्द इतने बेमिसाल लगते हैं,
सोचो…
शब्दों में जो हैं, वो कितने बेमिसाल लगते होंगे।

मेरे ग़ज़लों में, गीतों में लिखे, हर शब्द में तुम हो,
तुम्हीं को सोचकर जीते हैं,
हर लम्हे में बस तुम हो।

हवाओं पे छूअन तेरी, मुझे महसूस होती है.
हर रोएँ पर उभरता है, अब अहसास तुम्हारा।

एक ग़ज़ल ‘मनन’ की पढ़ता हैं कहीं कोई,
एक नमी सी अचानक आँखों में आ जाती है।

मैं इस दुनिया में छा जाऊँ, ये नहीं ख्वाहिश मेरी,
मैं सिर्फ़ चाँद सा चमकूँ, इतनी सी गुज़ारिश है।

नीरज मनन