शीर्षक- मैं नारी

कविता-

ये मेरी अदाकारी
मैं नारी…..
जिसके बल पर तो समाज है जारी।

मैं नारी,
कुछ टूटी और तोड़ी सी,
मरोड़ी और अधूरी सी।
हर हाल में मैं ख़ुश रहती,
हर जुल्म को चुप से सहती।
अपने जीवन के सब सपने,
कुछ तेरे और कुछ अपने।
बस तेरे संग सजा लेती,
ख़्वाबो को दबा देती।
खुद के नाम के आगे,
तेरा नाम लगा लेती।
और
त्याग की मूरत बनकर मैं,
तेरा नाम सजा देती।

ये मेरी अदाकारी
मैं नारी…..
जिसके बल पर तो समाज है जारी।

खींच दुशाशन जब मुझे,
बीच सभा ले आया।
नारी समान पुरुषों को भी,
मैने अबला पाया।
अत्याचार मुझ नारी पर,
कब से होता आया।
नारी जाती को सम्मान,
समाज दिला ना पाया।
सीता की अग्नि परीक्षा,
क्यूँ ज़रूरी हो जाती है।
क्यूँ समाज में नारी केवल,
गीतों में पूजी जाती है।
समाज को साथ लेकर,
क्यूँ चले यह नारी।
क्यूँ हमेशा तुम्हें सुने
और क्यूँ सहे यह नारी।

ये मेरी अदाकारी
मैं नारी…..
जिसके बल पर तो समाज है जारी।
भर कर माँग सिंदूर की सर में,
सुखद बँटवारा करती जीवन में।
घर को आकार मैं देती,
तेरे घर को जन्नत कर देती।
देवी बना कर मत सजाओ,
मुझको बस इंसान बनाओ।
इंसां का हक़ तुम दिलवाओ,
इस समाज में जगह दिलाओ।
आबरू लुट जाती मेरी सारी!
क्यूँ समाज में है लाचारी।
अब चुप ना रहूँगी, अब ना सहूँगी,
अब मैं बिल्कुल बुत ना रहूँगी।
बैठ अदालत की कुर्सी पर,
एक-एक का हिसाब करूँगी।
मेरी ख़ामोशी कमजोरी ना,
अब मैं वो आवाज़ करूँगी।
रोंदों ना मेरी हया को,
अपने अलग अन्दाज़ करूँगी।
रोशनी अगर ज़रूरत है,
खुद जल मैं प्रकाश करूँगी।
तुम लेलो ये चूड़ी मेरी,
अब तेरा उपहास करूँगी।
पिंजरे में बंद अरमानो को,
अब मैं इसको आज़ाद करूँगी।

ये मेरी अदाकारी
मैं नारी…..
जिसके बल पर तो समाज है जारी।